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(3) 'अर्थ' के अनुसार क्रियाविशेषण के भेद
(i) परिमाणवाचक क्रियाविशेषण- जो शब्द क्रिया परिमाण या माप प्रकट करते है उन्हें 'परिमाणवाचक क्रियाविशेषण' कहते है।
जैसे -बहुत, थोड़ा, अधिक, कम, छोटा, कितना आदि
उदाहरण- आप अधिक बोलते हो।
यहाँ अधिक शब्द क्रिया (बोलने )की माप प्रकट करता है। इसलिए अधिक शब्द परिमाणवाचक क्रियाविशेषण है।

(क) अधिकताबोधक- बहुत, अति, बड़ा, बिलकुल, सर्वथा, खूब, निपट, अत्यन्त, अतिशय।
(ख) न्यूनताबोधक- कुछ, लगभग, थोड़ा, टुक, प्रायः, जरा, किंचित्।
(ग) पर्याप्तिवाचक- केवल, बस, काफी, यथेष्ट, चाहे, बराबर, ठीक, अस्तु।
(घ) तुलनावाचक- अधिक, कम, इतना, उतना, जितना, कितना, बढ़कर।
(ड़) श्रेणिवाचक- थोड़ा-थोड़ा, क्रम-क्रम से, बारी-बारी से, तिल-तिल, एक-एककर, यथाक्रम।

(ii) रीतिवाचक क्रियाविशेषण- जो शब्द क्रिया की रीती या ढंग बताते है उन्हें रीतिवाचक क्रियाविशेषण कहते है।
जैसे- सहसा, वैसे, ऐसे, अचानक आदि।
उदाहरण- कछुआ धीरे-धीरे चलता है।
यहाँ धीरे-धीरे शब्द क्रिया होने ढंग बता रहा है।
इस क्रियाविशेषण की संख्या गुणवाचक विशेषण की तरह बहुत अधिक है। ऐसे क्रियाविशेषण प्रायः निम्नलिखित अर्थों में आते हैं-

(क) प्रकार- ऐसे, वैसे, कैसे, मानो, धीरे, अचानक, स्वयं, स्वतः, परस्पर, यथाशक्ति, प्रत्युत, फटाफट।
(ख) निश्र्चय- अवश्य, सही, सचमुच, निःसन्देह, बेशक, जरूर, अलबत्ता, यथार्थ में, वस्तुतः, दरअसल।
(ग) अनिश्र्चय- कदाचित्, शायद, बहुतकर, यथासम्भव।
(घ) स्वीकार- हाँ, जी, ठीक, सच।
(ड़) कारण- इसलिए, क्यों, काहे को।
(च) निषेध- न, नहीं, मत।
(छ) अवधारण- तो, ही, भी, मात्र, भर, तक, सा।

कुछ समानार्थक क्रियाविशेषणों का अन्तर
(i) अब-अभी 'अब' में वर्तमान समय का अनिश्र्चय है और 'अभी' का अर्थ तुरन्त से है; जैसे-
अब- अब आप जा सकते हैं।
अब आप क्या करेंगे ?
अभी- अभी-अभी आया हूँ।
अभी पाँच बजे हैं। 
(ii) तब-फिर- अन्तर यह है कि 'तब' बीते हुए हमय का बोधक है और 'फिर' भविष्य की ओर संकेत करता है। जैसे-
तब- तब उसने कहा।
तब की बात कुछ और थी।
फिर- फिर आप भी क्या कहेंगे।
फिर ऐसा होगा।
'
तब' का अर्थ 'उस समय' है और 'फिर' का अर्थ 'दुबारा' है।
'
केवल' सदा उस शब्द के पहले आता है, जिसपर जोर देना होता है; लेकिन 'मात्र' 'ही', उस शब्द के बाद आता है।
(iii) कहाँ-कहीं- 'कहाँ' किसी निश्र्चित स्थान का बोधक है और 'कही' किसी अनिश्र्चित स्थान का परिचायक। कभी-कभी 'कही' निषेध के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है; जैसे-
कहाँ- वह कहाँ गया ?
मैं कहाँ आ गया ?
कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली!
कहीं- वह कहीं भी जा सकता है। 
अन्य अर्थों में भी 'कही' का प्रयोग होता है-
(
क) बहुत अधिक- यह पुस्तक उससे कहीं अच्छी है। (ख) कदाचित्- कहीं बाघ न आ जाय। (ग) विरोध- राम की माया, कहीं धूप कहीं छाया।
(iv) न-नहीं-मत- इनका प्रयोग निषेध के अर्थ में होता है। '' से साधारण-निषेध और 'नहीं' से निषेध का निश्र्चय सूचित होता है। '' की अपेक्षा 'नहीं' अधिक जोरदार है। 'मत' का प्रयोग निषेधात्मक आज्ञा के लिए होता है। जैसे-
''- इनके विभित्र प्रयोग इस प्रकार हैं-
(
क) क्या तुम न आओगे ?
(
ख) तुम न करोगे, तो वह कर देगा।
(
ग) '' तुम सोओगे, न वह।
(
घ) जाओ न, रुक क्यों गये ?
नहीं- (क) तुम नहीं जा सकते।
(
ख) मैं नहीं जाऊँगा।
(
ग) मैं काम नहीं करता।
(
घ) मैंने पत्र नहीं लिखा।
मत- (क) भीतर मत जाओ।
(
ख) तुम यह काम मत करो।
(
ग) तुम मत गाओ।
(v) ही-भी- बात पर बल देने के लिए इनका प्रयोग होता है। अन्तर यह है कि 'ही' का अर्थ एकमात्र और 'भी' का अर्थ 'अतिरिक्त' सूचित करता है। जैसे-
भी- इस काम को तुम भी कर सकते हो।
ही- यह काम तुम ही कर सकते हो।
(vi) केवल-मात्र- 'केवल' अकेला का अर्थ और 'मात्र' सम्पूर्णता का अर्थ सूचित करता है; जैसे-
केवल- आज हम केवल दूध पीकर रहेंगे। यह काम केवल वह कर सकता है।
मात्र-, मुझे पाँच रूपये मात्र मिले।
(vii) भला-अच्छा- 'भला' अधिकतर विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है, पर कभी-कभी संज्ञा के रूप में भी आता है; जैसे- भला का भला फल मिलता है।
'अच्छा' स्वीकृतिमूलक अव्यय है। यह कभी अवधारण के लिए और कभी विस्मयबोधक के रूप में प्रयुक्त होता है। जैसे-
अच्छा, कल चला जाऊँगा।
अच्छाआप आ गये !
(viii) प्रायः-बहुधा- दोनों का अर्थ 'अधिकतर' है, किन्तु 'प्रायः' से 'बहुधा की मात्रा अधिक होती है।
प्रायः- बच्चे प्रायः खिलाड़ी होते हैं।
बहुधा- बच्चे बहुधा हठी होते हैं।
(ix) बाद-पीछे- 'बाद' काल का और 'पीछे' समय का सूचक है। जैसे-
बाद- वह एक सप्ताह बाद आया।
पीछे- वह पढ़ने में मुझसे पीछे है।




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